Wednesday, 22 May 2024

सब्र

मेरा मंजिल की तरफ जाना 
कभी बेकरारी न थी 
मैं जानता था वो मेरी 
आखरी मंजिल न थी 
लोग जो राहे अदल पर 
शिरकते कारवां किये 
एक अदद मकाम तक भी 
उनकी सब्र बाकी न थी 
क्या ही अब इल्ज़ाम दे यारों उन्हें 
जो यक ब यक रुसवा हुए 
कोई राह 'रवि' बाकी नहीं 
तूने कभी देखी न थी 
कवि 'रवि'

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