सब्र
मेरा मंजिल की तरफ जाना
कभी बेकरारी न थी
मैं जानता था वो मेरी
आखरी मंजिल न थी
लोग जो राहे अदल पर
शिरकते कारवां किये
एक अदद मकाम तक भी
उनकी सब्र बाकी न थी
क्या ही अब इल्ज़ाम दे यारों उन्हें
जो यक ब यक रुसवा हुए
कोई राह 'रवि' बाकी नहीं
तूने कभी देखी न थी
कवि 'रवि'

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