तमन्ना
सोचता हूं जागकर मैं रात को रुसवा करूं
सोचूं फिर नाकाम हूं जागकर भी क्या करूं
सांस ना लेने की मोहलत भी नहीं है क्या करूं
सांस को भीतर दबाने के लिए मैं क्या करूं
एक पल की जिंदगी तू इस कदर लंबी हुई
काबिले बर्दाश्त ना हो तो भी जियूं क्या करूं
आबाद हूं जाने जहां पर मैं तो बुत भी ना रहा
वो पुकारें रोज़ मुझको ना सुनूं मैं क्या करूं
लम्हे लम्हे की कड़ी बढती रही ऐ आसमां
वो सिरा पिछडा कहां अंजान हूं अब क्या करूं
रात भी रुकती नहीं है सोच भी ऐसी 'रवि'
लाख ठुकराता हूं पर करती हुकूमत क्या करूं
कवि 'रवि'

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