Wednesday, 22 May 2024

तमन्ना

सोचता हूं जागकर मैं रात को रुसवा करूं 
 सोचूं फिर नाकाम हूं जागकर भी क्या करूं 
सांस ना लेने की मोहलत भी नहीं है क्या करूं 
सांस को भीतर दबाने के लिए मैं क्या करूं 
एक पल की जिंदगी तू इस कदर लंबी हुई
काबिले बर्दाश्त ना हो तो भी जियूं क्या करूं 
आबाद हूं जाने जहां पर मैं तो बुत भी ना रहा 
वो पुकारें रोज़ मुझको ना सुनूं मैं क्या करूं 
लम्हे लम्हे की कड़ी बढती रही ऐ आसमां 
वो सिरा पिछडा कहां अंजान हूं अब क्या करूं 
रात भी रुकती नहीं है सोच भी ऐसी 'रवि'
लाख ठुकराता हूं पर करती हुकूमत क्या करूं 
कवि 'रवि'

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