है आस क्यों उसकी अभी
है आस क्यों उसकी अभी
जिसको कभी चाहा नहीं
थी महफिलें राहे अदल पर
यूं कोई शय भरमाया नहीं
वो नाजिरे मैकश मुझे
लाख उकसाता रहा
बाद तौबा के ये दिल
जूस्तजू कर पाया नहीं
आजकल जब तिश्नगी
चाहत बनीं ही है 'रवि'
झोंक दे खुद को भंवर में
के साथ साया भी नहीं
कवि 'रवि'

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