Thursday, 20 November 2025

गुजारिश


याद आती है वो शाम 
जिसने हमें मिलाया था 
फिसलती उसकी नज़रों में 
मैंने मुझे ही पाया था 
वो लम्हा अकीदत का 
प्यार के खातिर 
कुर्बान हुआ 
वो कैसा समां ईश्वर तूने 
मेरे नसीब में लाया था 
पर सच कहूं तो अहसानमंद हूं तेरा 
मेरे नसीब के मानी बदलने वाली से 
तूने मुझे मिलाया था 
अरसा बीत गया है लेकिन 
प्यार है के कम नहीं होता 
सांसों ने ज़ेहन के साथ मानो 
अटूट रिश्ता बनाया था 
अब एक गुजारिश है ईश्वर तुझसे 
बस वैसे ही हमें बुला लेना 
जैसा हमें मिलाया था 
कवि 'रवि'

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