गुजारिश
याद आती है वो शाम
जिसने हमें मिलाया था
फिसलती उसकी नज़रों में
मैंने मुझे ही पाया था
वो लम्हा अकीदत का
प्यार के खातिर
कुर्बान हुआ
वो कैसा समां ईश्वर तूने
मेरे नसीब में लाया था
पर सच कहूं तो अहसानमंद हूं तेरा
मेरे नसीब के मानी बदलने वाली से
तूने मुझे मिलाया था
अरसा बीत गया है लेकिन
प्यार है के कम नहीं होता
सांसों ने ज़ेहन के साथ मानो
अटूट रिश्ता बनाया था
अब एक गुजारिश है ईश्वर तुझसे
बस वैसे ही हमें बुला लेना
जैसा हमें मिलाया था
कवि 'रवि'

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