कहकशां
कहकशां सी मेरी सपनों की दुनिया है
किसी एक पर नज़र ठहरती नहीं है
इसे समझूं या उसे जानूं कश्मकश में
हर रात गुज़र जाती है
उम्र लेकिन
उसी मक़ाम पर ठहर जाती है
दिन निकलते ही जीने की उधेड़बुन
मुझे मुझसे ही ले जाती है कहीं दूर
जहां जिंदगी सिकुड़ सी जाती है
ज़माने की फ़िक्र और समाजों का बोझ
लिए जाता है अनचाहे सवालों तक
किससे कहें कि परेशानी क्या है
हर एक की कहानी यही है
इंतजार फिर एक बार होता है
कि रात आए नींद आए और मैं खो जाऊं
कहकशां सी मेरी सपनों की दुनिया में
इस बार फकत हकीकत में बदल जाने के लिए
कवि 'रवि'

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