Saturday, 22 November 2025

कहकशां

कहकशां सी मेरी सपनों की दुनिया है 
किसी एक पर नज़र ठहरती नहीं है 
इसे समझूं या उसे जानूं कश्मकश में 
हर रात गुज़र जाती है 
उम्र लेकिन 
उसी मक़ाम पर ठहर जाती है 
दिन निकलते ही जीने की उधेड़बुन 
मुझे मुझसे ही ले जाती है कहीं दूर 
जहां जिंदगी सिकुड़ सी जाती है 
ज़माने की फ़िक्र और समाजों का बोझ 
लिए जाता है अनचाहे सवालों तक 
किससे कहें कि परेशानी क्या है 
हर एक की कहानी यही है 
इंतजार फिर एक बार होता है 
कि रात आए नींद आए और मैं खो जाऊं 
कहकशां सी मेरी सपनों की दुनिया में 
इस बार फकत हकीकत में बदल जाने के लिए 
कवि 'रवि'

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