Thursday, 4 December 2025

फित़रत

शाख ने छोड़ा हो चाहे 
गिरने से पहले 
मस्ती में लहराते रहे 
हुनर बहार का अक्सर 
हमीं ठहराते रहे 
याद करें हर दरख़्त 
खूबसूरती हमीं से थी 
सोज़े बहार गुलिस्तां में 
हमीं आजमाते रहे 
चरमरा कर कदमों तले 
मौसिकी निकाल लाते रहे 
ऐ बागबां वाले जाप्ता दर जाप्ता
तेरी चाहत को निभाते रहे 
एक ऐसा भी दौर आएगा 'रवि'
रुख़सत राहे मुक़द्दस पे तुम 
और लोग रोते रहे 
कवि 'रवि' 

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