फित़रत
शाख ने छोड़ा हो चाहे
गिरने से पहले
मस्ती में लहराते रहे
हुनर बहार का अक्सर
हमीं ठहराते रहे
याद करें हर दरख़्त
खूबसूरती हमीं से थी
सोज़े बहार गुलिस्तां में
हमीं आजमाते रहे
चरमरा कर कदमों तले
मौसिकी निकाल लाते रहे
ऐ बागबां वाले जाप्ता दर जाप्ता
तेरी चाहत को निभाते रहे
एक ऐसा भी दौर आएगा 'रवि'
रुख़सत राहे मुक़द्दस पे तुम
और लोग रोते रहे
कवि 'रवि'

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