Friday, 5 December 2025

शहर अनजान और दिल नादान




ये शहर अनजान आबोहवा नासाज
सनम की बेवफाई का जरूर है कोर्ई राज
सांसों की आवाजाही महज़ एक आदत रह गई
जमीं पे बिछ गया है जैसे कोई परवाज़
ऐ दिले नादान तेरी हरकतें नागवार
ना कोर्ई कल बचा ना रहा कोई आज
शहर भी धुंधलके में छिपा जा रहा है
तेरी चीखों में नहीं बची है आवाज
दिल की दहलीज पर क्यों खडी करता है तमन्ना
ना कोई आहट कहीं ना कोई गमसाज
कवि 'रवि'

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