स्वतंत्रता?!
ओ मेरी स्वर्णमयी स्वतंत्रता,
तेरी स्वर्ण जयंती मना रहा हूँ ||१
घने काले बादलों के पार उस तरफ,
तेरे स्वर्णीम प्रकाश को देख रहा हूँ |
मेरा आज मेरे कल से बदतर सही
स्वतंत्रता से सांस ले रहा हूँ |
चुन कर जिन्हें दिया मैने स्वतंत्रता से,
वे लूट मचा रहे है, मैं देख रहा हूँ |
आभास और अस्तित्व दोनों के बीच.
कुचलता हुआ विश्वास देख रहा हूँ |
फीर भी खामोश, बेलाग, अनजान सा
बेझिझक और बेबाक जी रहा हूँ |
लेकीन मै चाहूँगा मेरी स्वतंत्रता,
तू जिये और चिरंतन जिये |
क्योंकि तुझे पाने के लिये
हजारो लाल तब मर के जिये |
उनके अरमानों का फल है तू
कुर्बानी उनकी और निशाँ है तू |
कुर्बानी उनकी और निशाॅं है तू
उनके बोये इस बरगद को
ये चूहे चाहे उतना कुलर डाले,
लेकीन में कुछ नहीं बिगाड़ सकते
क्योंकि आज भी उसी खून का कतरा
पल रहा है बनकर खतरा
और उठेगा, जब वह उठेगा
आँधी और तूफान बन कर
फिर एक बार घटित होगी क्रांति
अपनों ही के विरुद्ध सत्य की खातिर
जो होगा संकेत सच्ची, सुहानी स्वर्णमयी स्वतंत्रता का ॥
मेरी स्वतंत्रता,तू जिये, जुग जुग जिये
कवि'रवि'

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