गज़ले मैख्वार
पांव झूमने लगे जाम चलने लगे
आज महफ़िल में कोई खुमांर आ गया
आशिकी में तेरी गर न डुबते थे हम
माशुकी से तेरी गर न खिलते थे हम
मुझको दर्या समंदर न लेते करीब
कोई कहता था कुफ्रे शराब आ गया... पांव
ये न समझो रवि तो न अपना हुआ
तुम जहां भी रहो मैं रहूंगा वहां
ये न सोचो के हम-तुम मिले ही नहीं
मैं समझता हूं रुहों को प्यार हो गया... पांव
हुस्न की ताज़गी चंद घंटों की है
वक्त की दिलकशी इक नशा ही तो है
तेरी रूहे गरज़ गर पुकारे मुझे
लोग देखेंगे चलके मज्हार आ गया... पांव
मुझको अपना समझ ये खता तो नहीं
तेरी चाहत जहां को पता तो नहीं
तुम जहां से यूं परदा बरतती रहो
मैं तो तुम पर कभी जांनिसार हो गया... पांव
देख साकी मेरी एक दीवानगी
एक ये मैकशी एक आवारगी
कम से कम तूने मुझको बुलाया तो है
आज दिल की मैं तोडे दिवार आ गया... पांव
कवि'रवि'

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