तिनका
मचलते साहिल पे यूँ सफीना चला
डोलते कंधो पे जैसे जनाजा चला
मेरा दिल एक तिनका ही सही
मंजील की आस में बेकरार चला
अश्क की दर बूंद के साथ
तेरी सूरत छलकती देखी
टूटते सितारे की आह तक
तेरे ही खातिर देखी
बेवफा तेरे बेरहमी के आलम सें
पत्थर की धड़कन भी बंद होती देखी
आज अपने ही के हाथों निलाम हो गया बेफुर्सत फीरभी नाकाम हो गया
तेरे कदमों के निशाँ ढूंढते-ढूंढते
राहे अमल पे बेनिशाँ हो गया
कवि'रवि'

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