गुज़ारिश
कोई परवाने से कह दें,
खुद को जलाता क्यों है
शमा तो जलती है जलाने के लिये
बागबां भी रहम फर्मा है
तुझको रिझाने के लिए
ये गुलिस्तां ये चमन हैं बहार पे
तेरे शिकवे तेरे ग़म को मिटाने के लिए
बाद समझाने के भी
तुझको आया न इलम कोई
तेरीरी हस्ती है खुदको लुटाने के लिये
परखाने खुद को जलाता क्यों है
शमा तो जलती है जलाने के लिये
कवि'रवि'

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