Saturday, 12 June 2021

बारूद

मेरे गीत घुंगरूओं के संग 
जब थिरकने लगते हैं
उलझे उलझे से कदम
वही रुकने लगते हैं
देखकर दोज़ख की
रूहानी महफ़िल
शेखो बरहमन भी 
चूकने लगते हैं
अल्फाज (जुबाँ) कुदरत का करिश्मा हैं
बेगुमान भी समझने लगते
तेरी अदाओं से रूबरू होकर 
ना फर्मान भी बहकने लगते हैं
पेश करता हूँ जब 
कोई इन्क़लाबी शेर
अच्छे अच्छों के दिल धड़कने लगते है
कवि'रवि'

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