बारूद
मेरे गीत घुंगरूओं के संग
जब थिरकने लगते हैं
उलझे उलझे से कदम
वही रुकने लगते हैं
देखकर दोज़ख की
रूहानी महफ़िल
शेखो बरहमन भी
चूकने लगते हैं
अल्फाज (जुबाँ) कुदरत का करिश्मा हैं
बेगुमान भी समझने लगते
तेरी अदाओं से रूबरू होकर
ना फर्मान भी बहकने लगते हैं
पेश करता हूँ जब
कोई इन्क़लाबी शेर
अच्छे अच्छों के दिल धड़कने लगते है
कवि'रवि'

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