सुकून
हर शब की शहर नयी होती है
आफताब की नजर नयी होती है
रोशन होता है जहाँका हर मंजर
मंजिल की खबर नयी होती है
नया दौर, हौसले भी नये होते है
आरजुओं की फेहरिस्त अक्सर नयी होती है
दुआऐं, मन्नतें, इक्बालो मदद
हर अदा की अदाऐं नयी होती है
ढलते शाम के आगोश में
पहुंचकर होता है हिसाब
दिल को समझाने की लज्ज़त नयी होती है
कर हवाले निंद के सोता है हर इन्सान
पुर सुकूँ इस ख्याल से
हर शब की सहर नयी होती है
कवि'रवि'

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