तन्हाई
शिकवे गिले किससे करें....
तुम हो ओझल दूर दूर
नजरें घायल सी होकर .....
तुम्हे खोजती है दूर दूर
आ जाओ इस कदर भी ना....
हमपे सितम ढाओ
हक है मुझे के लिपटाकर तुम्हे....
ले उड चलूँ इस जहाँ से दूर ॥१॥
याद कर के वो दिन वो रातें.....
दिल और भी तडपता है
चाहत पे मेरी भरोसा कर .....
न जा मुझसे इतनी दूर
जाना ही था, क्यों छेड़ दिया......
दिल के तारों को बरबस
झन्कार गुंजेगी तेरे कानो में .....
चाहे जाओ जितनी दूर
कवि'रवि'

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