Saturday, 12 June 2021

हकीकत

शहर की गलियाँ 
तंग होती गयी 
सिमटते सिमटते बस्तियाँ
सिकुड़के रह गयी
शाहबाज कोई 
और कोई फ़कीर 
शहर में इन्सानियत 
खोके रह गई
क्या तू मुझे
क्या मैं तुझे 
दोस्ती की शहर में 
बुनियाद ढह गई 
गरचे दो अश्क़ भी 
बहा बहा जाता है कोई
शहर में वो मिसाल 
यादगार बन गई 
जुबाँ पे तारीफ़
खलूस में है चोर 
इन वाकयों की शहर को 
आदत सी हो गई
अदना सा मैं 
भला क्या देखूँ 
इन नजारों से आँखे 
दंग रह गई
कवि'रवि'

0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home