हकीकत
शहर की गलियाँ
तंग होती गयी
सिमटते सिमटते बस्तियाँ
सिकुड़के रह गयी
शाहबाज कोई
और कोई फ़कीर
शहर में इन्सानियत
खोके रह गई
क्या तू मुझे
क्या मैं तुझे
दोस्ती की शहर में
बुनियाद ढह गई
गरचे दो अश्क़ भी
बहा बहा जाता है कोई
शहर में वो मिसाल
यादगार बन गई
जुबाँ पे तारीफ़
खलूस में है चोर
इन वाकयों की शहर को
आदत सी हो गई
अदना सा मैं
भला क्या देखूँ
इन नजारों से आँखे
दंग रह गई
कवि'रवि'

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