बज्मे इशरत
शाम जब ढल के
रात में बसर करती है
इशरतें मय
रिंदों पे असर करती है
पैमाने पैमानों से टकराकर संभल जाते हैं
रिंदो की महफ़िल आसमानी सफर करती हैं बहकते हैं कदम लडखडाती है जुबाँ
उस पर कुछ और भी असर
साकी की नज़र करती है
मैखाने पे उतर आता है पूरा शबाब़
ऐसे आलम पे जन्नत भी मेहेर करती है
न वक्त की खबर न दुनियादारी का होश
बस करती है सिर्फ शराब अमल करती है
कवि'रवि'

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