Saturday, 12 June 2021

मेरी हस्ती और हालात

आंधी से कतराते हुए
पहुंचा जो किनारे के पास 
सामने सैलाब को पाया
और मायूस हो गया 
इरादों के साथ वास्ता तोड़कर
हश्र में ग़म को पाकर
गुमराही के आलम में
चाहने लगा किसी का साथ
तूफान भी बे गैरत हो कर 
चल पडे साहील की मोहब्बत में
रेत पर अश्क गिर पड़े तो
तेजी से रेत के हो लिये
जैसे दूसरे से छीन कर लाये हो
मेरी हस्ती तुझपे कुदरत क्यों है
इतनी बे मेहरबाँ 
जैसे तुम उसके ना चाहने पर भी 
धरती पर आये हो 
कवि'रवि'

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