मेरी हस्ती और हालात
आंधी से कतराते हुए
पहुंचा जो किनारे के पास
सामने सैलाब को पाया
और मायूस हो गया
इरादों के साथ वास्ता तोड़कर
हश्र में ग़म को पाकर
गुमराही के आलम में
चाहने लगा किसी का साथ
तूफान भी बे गैरत हो कर
चल पडे साहील की मोहब्बत में
रेत पर अश्क गिर पड़े तो
तेजी से रेत के हो लिये
जैसे दूसरे से छीन कर लाये हो
मेरी हस्ती तुझपे कुदरत क्यों है
इतनी बे मेहरबाँ
जैसे तुम उसके ना चाहने पर भी
धरती पर आये हो
कवि'रवि'

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