जूस्तज़ू
कहाँ तेरा जवाँ हुस्न ये नादाँ
और उसकी वो शबनमी सादगी कहाँ
वो तुझमें हो सकती है शायद
बेशक यकीन है मुझे उसमें तू कहाँ अठखेलियाँ करती, शरारतभरी तेरी नजर नजरों से दुआ आदाब बजाती है
उसकी नजर
राह चलते तू उड़ाये राहबर का सुकूं
वो चले राह पर हम बजा लाते है सलाम
रंगे हिना तेरे होठों पे और गाल जैसे गुलाब उसको देखूँ, नजराता है आसमानी शबाब हुस्न वाले और भी होंगे तेरी मानिंद
खुदाया दुनिया में उसका कोई सानी नहीं
कुदरत ने तुझे बनाया हे लाजवाब
उपर से उसमें पिरोया है माहताब
तेरी दिलकशी
मुझमें चाहत जगा जाती है
पर उसके आगोश में रूहानी
इबतदाहोती है।
तुम हो खूबसूरत शायरी
बनाने वाले की
वो कुरआनी आयत है समझने वाले की
ले तुझको भी सलाम और उसको भी सलाम लिखता ही रहूँ
कभी पूरा न हो मेरा कलाम
कभी पूरा न हो मेरा काम
कभी पूरा न हो मेरा कलम
कवि'रवि'

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