सबक
गर्दिशें
जब मेहरबां हो के आयी है
तब अश्क़ बहाता क्यों हे
परछाई
तुझसे दामन ही छुडा आयी है
आईना खुद को दिखाता क्यों है
वक्त बेवक्त में
बदल जाये तो
फितरत पे भरोसा
जताता क्यों है
रोशनी गरचे करें
तुझको बेनकाब
खुद को छुपाता क्यों है
रंजो ग़म का
उमड़ आया हे सैलाब
बे इंतेहा
आस को भगाता क्यों है
कवि'रवि'

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