करामत
शेख यूं मैकदे की गली से गुजर गया
खता मैख्वार की बदनाम साकी को कर गया
वो अब्र थे जो तजुर्बे को बहा ले गये
सितम तब हुआ वाईज़ को नापाक कह गया
न शराब होती न रिंदगी होती न कुफ्र ही होता
कश्मकश की ताबीर में हकीकत को खो गया
इश़रतों के इन्कलाबी सैलाब थे पुरअसर 'रवि'
कश्ती ए रिवायत के संग साहिल पे रह गया
आरज़ू ए जन्नत का आलम था इस क़दर
दोज़ख के लुत्फ से भी नावाकिफ रह गया
कवि'रवि'

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