एक ग़ज़ल
बाज़ आया तो कभी फिर से गुनाह कर दूंगा
पैमाना ए मुहब्बत बे पनाह कर दूंगा
आयी गर याद तो दरीचे पे आ जाओ
रंगीन कहानी को कुछ और रंगसार कर दूंगा
पेशतर वो मोहब्बत का अफसाना है रंगीन
दो शेर लिखकर उसे लाजवाब कर दूंगा
हैं आसमां शामिल 'रवि' ऐसी तलबगोई में
बिखरी हुई फिजां को सुर्ख लाल कर दूंगा
कवि'रवि'

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