पैसे से प्यार
इस पैसे की भूखी दुनिया में
मानवता का काम नहीं
सच और झूठ सब बिकता है
धर्म नियम का नाम नहीं.....इस पैसे की भूखी
रोज़ इश्तहार लुभावने
खुद को बिकवाने वाले
चकाचौंध में पुलिंदे है
हैं सभी खास, कोई आम नहीं.....इस पैसे की भूखी
सेवा का बहाना है
मेवे पे निशाना है
हैं चर्चे में वो ही जिसे
ठगने के सिवा कोई काम नहीं...इस पैसे की भूखी
दिन निकलें उनकी ही छबी
सब 'पेड प्रमोशन' का जलवा
हम रोज़ जगाएं दुनिया को 'रवि'
हमको की भला आराम नहीं...इस पैसे की भूखी
कवि'रवि'

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