श्री गुरु पूर्णिमा: एक चिंतन
श्री गुरु पूर्णिमा!
एक प्रयास होता है मानवी जीवन में कृतज्ञता व्यक्त करने का। सनातन संस्कृति में गुरु को अनन्य साधारण महत्व दिया गया है मुख्यतया इसलिए कि ये शाश्वत सत्य है, मनुष्य का बौद्धिक विकास गुरु के सहायता विना अशक्य है। क्या अपना एक गुरु हो सकता है? उत्तर है 'नहीं'।
गुरु के वयानुसार अवतरण
१ निसर्ग: जन्म के साथ रोना सिखाकर अपने अस्तित्व की पहचान दुनिया को कराता है।
२ माता: उस रुदन को सुनते ही स्वयं की स्थिति, प्रसुति दर्द को भुलाकर पोषण का जिम्मा उठाती है।
३ पिता: जीव को उन सभी स्थितियों से अवगत कराता है जो कि सुदृढ़ व्यक्तित्व बना सकें।
४ मित्र: जो बाल्यावस्था से ही सहजीवन का पाठ पढ़ाते हैं।
५ बांधव: पारिवारिक जीवन की आवश्यकता को सुलझाने की रीत जिनसे प्राप्त होती है।
६ शिक्षक: सामाजिक,सामुहिक तथा सामुदायिक जीवन की परिभाषा से अवगत कराते हैं, विभिन्न शास्त्रों से अवगत कराकर विशेष प्राविण्य प्राप्त करने में सहायक बनते हैं।
७ स्वानुभव: स्वयंसिद्ध बनने में अहम भूमिका निभाता है।
८ जीवन साथी: एक ऐसा गुरु जो किसी भी परिस्थिति में उत्साह में वृद्धि ही करता है।
९ प्रवास: सृष्टि, चराचर के ज्ञान से परिपूर्ण बनाता है।
१० वृद्धावस्था: मनुष्य को जीवन की सभी विधियों से मुक्त करा कर ईश्वर से जोड़ने में सहायक है।
११ मृत्यु: अंतिम सांस भी क्या होती है सिखाता है।
गुरु पूर्णिमा के इस परम पूजनीय पर्व पर आशा है आप को मेरा यह कथन संतोष दिलाएगा।
गुरु: ब्रह्मा: गुरु: विष्णु: गुरु:देव: महेश्वर:
गुरु: साक्षात परब्रह्म: तस्मै श्री गुरुवे नमः
कवि'रवि'

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