कसक
खामोशी ही अब जुबां का किरदार है
ये आलम कुछ और ही असरदार है
अक्सर अमल रहता है दिमाग पर
उन विचारों को जीने का दिल हकदार हैं
तारीख में मिलते हैं हजारों झूठ ऐसे
नाराज़ शख्सियत जंग करने को बेकरार है
इस माटी का भी कर्ज़ होता है इंन्सां पर
जान कर भी पिछड़ा हूं, जेहन शर्मसार है
उम्र का तकाजा है बड़ी देर हुई है 'रवि'
कुछ बोल ही दे दुनिया को इंतजार है
कवि'रवि'

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