आज और अफगान
अफगानिस्तान का सूरते हाल देखकर १४५० साल पहले मध्य पूर्व की सामाजिक स्थिति कैसी रही होगी इस बात को अनुभव किया जा सकता है। अफगानिस्तान एक ऐसा देश जहां २०वी सदी में तत्कालीन सोवियत संघ कब्जा जमाए बैठा था १० वर्ष तक। नरसंहार तथा वाणिज्य की हानि के साथ जनता को सु शिक्षा से भी वंचित रहना पडा। अफगान मुजाहिदीन के नाम पर रशिया से लडने वाला संगठन रशिया के वापसी के साथ गुटबाजी के चलते टूट गया और तालीबान नामक मूलतत्व वादी तथा बर्बर शासन के अनुगामी अपत्य को जन्म दे गया। रशियन माफिया ने इस दौरान सारे जगत में अपनी पैठ पुख्ता कर ली।
६ वर्ष तक इस अमानवीय तालिबान ने हजारों अफगानियों का कत्लोगारत किया और फिर एक बार वहां अमरिका सक्रिय हो उठी अफगान में सुस्थिती लाने के लिए।
२० वर्ष तक लाखों करोड़ों डॉलर बर्बाद करने के पश्चात्, अफगानिस्तान के सामान्य मानवी को उपलब्धि क्या है तो फिर एक बार तालिबान! दुनिया में सर्वश्रेष्ठ समझने वाले अमेरिकी नेतृत्व की बुद्धि मत्ता किस तरह की है इसका ताज़ा उदाहरण है अफगानिस्तान।
भारत जो कि अफगानिस्तान का पड़ोसी है आज भी यह मानता है कि यह प्रदेश अखंड भारत का एक हिस्सा है जो कि अंग्रेजों के कुटिल राजनीति का शिकार हो कर टूट गया और इसी कारण वहां की जनता को आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराने को प्राधान्य देकर विकास की सौगात दिलाने में रुचि रखता है।
बदलते समय के साथ चलने की आवश्यकता को अफगानियों सूझबूझ दिखानी होगी और जनताभिमुख शासन पुनः स्थापित करना होगा।
रहा भारत के सहयोग का प्रश्न तो भारत सदैव पीडितों का पक्षधर है और रहेगा, शर्त यही है कि विकासोन्मुख राजनीतिक स्थिति पैदा की जाए।
वर्तमान भारतीय परिप्रेक्ष्य में चंद असंतुष्ट नेता उत्साहित होकर अफगानिस्तान में तालिबान के काबिज होने पर बड़े खुश हुए हैं और अपनी ज़हालत का इजहार कर रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि इतने दशकों के बाद भी तालिबान एक प्रयास भर रहा है, जनमानस पर बाखुशी स्थापित नहीं हो सके। सदियों पुरानी रीति-रिवाजों को वर्तमान युग में जस के तस लागू करने की चाह रखने वाले आंख और बुद्धि दोनों का अंधापन ही प्रस्तुत कर रहे हैं। नतीजतन फिर एक बार अफ़गानी जनता को बर्बर शासकों को झेलना है तब तक कि वे एकजुट होकर समग्र अफगानिस्तान के विकास को बढ़ावा नहीं देते।

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