आखरी ख्वाहिश
जुनून है के अब देश की खातिर ही मर जाएॅं
नायाब सा एक काम ईस जनम् में कर जाएॅं
वक्त और दस्तूर जब मिल आये है साथ साथ
मौका है अपने नाम को अजरामर ही कर जाएॅं
ईस माटी का ऋण जो पुश्तों पे है चढा
अब अपने हाथों भरसक चुका जाएॅं
ऐ वतन तेरी सौंधी हवा है प्यासे दिल की दवा
सीने में आखरी सॉंस अब झूम के भर जाएॅं
© रवींद्र सरदेशमुख

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