जुनून
जुनून है के अब
देश की खातिर ही मर जाएं
नायाब सा एक काम
ईस जनम् में कर जाएं
वक्त और दस्तूर
जब मिल आये है साथ साथ
मौका है अपने नाम को
अजरामर ही कर जाएं
ईस माटी का ऋण
जो पुश्तों पे है चढा
अब अपने हाथों
भरसक चुका जाएं
ऐ वतन तेरी सौंधी हवा
है प्यासे दिल की दवा
सीने में आखरी सॉंस
अब झूम के भर जाएं
कवि'रवि'

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