संजय- जरा दम खा
ये खामोश सा मंज़र, ये थमती हवाएं
ये कहती तुम्हें है न बदली फिजाएं
तू इतना समझले ऐ नादाॅं मुसाफ़िर
है तूफान आगे ज़रा कर वफाएं
के आगोश तेरा है बहुत तंग फिर भी
चला जा रहा तू निगलने दिशाएं
है जिसपर सवार वो आबे बुलबुला है
हश्रे बेवकूफी तुझे गर्त ही मिला है
है चट्टान सा वो देवेंद्र भाई
ठहर जा तेरी यूं करेगा धुलाई
के तू भी भुलेगा जो है नाम तेरा
रे संजय खुलेगा फितरत का पिटारा
कवि'रवि'

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