ग़ज़ल: उनवान-"बेखुदी"
बेखुदी की भी इक कहानी है यारों
बिखरी मंज़िल की निशानी है यारों
तपते सहरां से सुकून मिलता है मुझे
उफनते दर्या से रवानी यारों
अफसाने हजार बुनते रहे लोग
दुनिया में मोहब्बत के
दास्ताने बेवफाई का भी है
चर्चा सरे आम यारों
के दिले नासाज़ को
एक फन भी बहला देता है
ता उम्र की शिकायत को
वाक़िफ है मौत का पैगाम यारों
वो कहते न थकता है 'रवि'
के बाबस्ता हूं उसूलों से
फिर भी करता रहता है हरदम
कोशिशें नाकाम यारों..... कोशिशें नाकाम यारों
कवि 'रवि'
आल अपूर्ण राहिली होती, आता पूर्ण केली.

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