Thursday, 11 May 2023

अश्के हयात

 वोअश्क जो सैलाब बहा लाते हैं 
मरतूत से ज़ेहन में इन्कलाब बहा लाते हैं 
सदियों की रवायतें खत्म करते हैं मुसलसल
क्या मंदिर क्या काबा दरो दीवार ढहा जाते हैं 

अश्के सब्रसार बने खूंखार इस कदर
आंधी तूफान की रफ़्तार मिटा जाते हैं 

ख्वाइश़ का पैमाना जो बिखरता है टूटकर
अश्क ही तो हैं जो उम्मीद बढा जाते हैं 

कहता है 'रवि' अश्कों को जाया न कर
ये बह जाते है तो फिर उधार नहीं आते हैं
कवि 'रवि'

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