अश्के हयात
वोअश्क जो सैलाब बहा लाते हैं
मरतूत से ज़ेहन में इन्कलाब बहा लाते हैं
सदियों की रवायतें खत्म करते हैं मुसलसल
क्या मंदिर क्या काबा दरो दीवार ढहा जाते हैं
अश्के सब्रसार बने खूंखार इस कदर
आंधी तूफान की रफ़्तार मिटा जाते हैं
ख्वाइश़ का पैमाना जो बिखरता है टूटकर
अश्क ही तो हैं जो उम्मीद बढा जाते हैं
कहता है 'रवि' अश्कों को जाया न कर
ये बह जाते है तो फिर उधार नहीं आते हैं
कवि 'रवि'

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home