नज़म
सूरज की ढलती किरनें
तपिश को भुला न सकीं
सुबह का मौका ढूंढने
उस तरफ जा धमकीं
रात का सफ़र हर एक को
लगता रहा के खत्म ना हो
पर सहर तो होनी ही है
मन्शा हो या ना हो
ता उम्र उधेड़बुन करते रहे
हासिल एक पल ना हुआ
आंखें सो गयी आखरी नींद
हिसाब अधूरा ही रहा
ढलती किरनें कुछ सिखा गई
ज़िंदगी के मायने मगर
वो रात जो नसीब हुई.....आखरी रही
सूरज तो फिर आ धमका....मगर
फिर सहर न हुई.... फिर सहर न हुई
कवि 'रवि'

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