ग़ज़ल
क्या उनकी बेहयाई का मातम करे कोई
ना आशना तो हम भी थे पर आंख भर आई
लफ़्ज़ों की कतारें करती है कोशिशें
कागजो कलम को यूं रुसवा करे कोई
शिकवा कभी ना किया हमने नाफरमानी का
अदब की दास्तां ही यूं बदल गया कोई
राहबर उनके कभी अब अंजान से 'रवि'
मंजिल मिटा न सका तो रास्ता धुंधला गया कोई
कवि 'रवि'

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