नज़म:- एक अकेला मैं
एक अकेला मैं और
सारा जहां उस तरफ
जुनून की हद हूं मैं
और दीवानगी उस तरफ
न गिने है छाले
न पर्वाह ही की है
बिछी जो खून की कतारें
दिखी घबराहट उस तरफ
आसमां वाला भी कभी
पूछ लेता है हाल अपना
रहनुमाई पर उसके
बौखलाहट उस तरफ
एक अरसा लगा है यारों
इस मक़ाम पर आते आते
फिर भी कैसे हासिल हुआ
यह सवाल उस तरफ
अब तो खत्म सा है 'रवि'
अरमानों का काफिला
फिर भी न जाने क्यों
है इंतज़ार उस तरफ
कवि 'रवि'

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