नामोनिशान
बेदर्द, बे मुरव्वत
क्या क्या नहीं हूं
मैं खुश हूं चूंकि
कुछ कहलाया तो हूं
हूए लोग ऐसे
जिये जो जहां में
बडी आस लेकर
तशद्दूद की एवज
मिले ख़ाक में
हुए बेनिशां वक्त के साथ में
मैं अभी तक जहां में
समाया तो हूं
है इक रोज़ की
सभी की कहानी
घडी भर का बचपन
घडी भर जवानी
वो प्यारे से रिश्ते
वो इशरत दिवानी
मुझे कागजों पर
दिखे मेरी दुनिया
वो सिमटी हुई
मुख्तलिफ कहानियां
मैं अपनी जुबां को
बनाकर तरन्नुम
कभी पेशे खिदमत लाया तो हूं
कवि 'रवि'

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