दश़्ते शहर
दश़्ते शहर में इक तमन्ना लेके आया था
हौसला ए सिकंदर और मुरादें लेके आया था
उसूलो रिवायत फना सी हो गई सारी
ये कैसा मौका और क्या दस्तूर लेके आया था
बुलंदी थी इरादों में और ज़ेहन में ख़ुमारी थी
हुनर हाथों में था, बला की शख्सियत हमारी थी
तभी तासीर उस पल की ज़रा ही साथ कर देती
मैं अपनी उस फतह का हर तराना लिखके आया था
न छूती थी कभी मायूसी मेरे जज़्बात को यारों
के सैलाबों पे भी तर जाना हमें मालूम था यारों
तपिश सहरां की डराने को भी ललचाये
मैं अपने हर मुहब्बत का जनाजा ढो के आया था
चलो इकबार फिर से आजमा लें आखिरी पासा
कुआं कुछ ना कहे तुझसे 'रवि' तू आदतन प्यासा
के हस्ती ना मिटेगी तेरी सदियों तक तारीख से
तेरी मर्जी की मिल्कीयत खुदा से लेके आया था
कवि 'रवि'

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