Thursday, 1 June 2023

कारवां ए बदहवास

वो कहता रहा
अगले मक़ाम तक
मेरा साथ दो
मगर
रहगुज़ार निकलते गये 
कारवां बिछडता गया
अपने अरमानों को
गठरी में बांध
वो असहाय, नाक़ाबिल 
घिसटता रहा उस तरफ
जिधर चंद चलती हुई लाशें
धुंधली सी नजर आ रही थी
बावक्त उस इन्सान का
यह बेवक्त बिखर जाना
क्या उसकी फितरत समझें
या के फिर नाकारा कुदरत

लोग कहते हैं 
अक्सर गूफ्तगू करते हैं 
भई इन्सान तो बहुत अच्छा था
पर ख़याल
इन्कलाबी रखता था
हो न हो इक दिन उसका
यही हाल होना था
................

यूं ही घसीटते हुए फिर कभी
उसे दूसरी दुनिया मिल गयी
...........
राहत की सांस लेते हुए
इधर की दुनिया ने उसे
पुतला बनाकर रच दिया
एक चौराहे पे

साल के तीनसौ चौसठ दिन
परिंदे उसके साथ होते हैं
पर एक दिन
उसकी मौत का मातम मनाने
वही दरिंदे आ धमकते हैं
अपना महंगा अभिवादन 
उसकी तरफ उछालते हैं
फर्राटा भरने वाली
बडी बडी टायरों वाली
गाड़ियों से धूल चखाकर
निकल जाते हैं 

जिन्होंने कभी उसके बताए
राह पर चलते चलते
उसी को अनदेखा कर
अपना स्वार्थ कमाया था
गैंडे की खाल पहने
मगरमच्छ का दिल लिए
सियार की बुद्धि की
आजमाइश करने वाले
वे सभी आज एक दिन
आते हैं 
कदम दर कदम
हार फूल रुपए वगैरह चढाते है
बगैर आंख मिलाए
उसके गुणगान करते हैं
अपने ही नज़रों में सिकुड कर
धीरे से फाख्ता हो जाते हैं

वह खडा है लेकिन
इस इंतज़ार में
के एक दिन कोई आएगा
उसकी राह को अपने
विचारों में तब्दील कर
एक नया दौर लाएगा
ताकि फिर कभी उस मक़ाम तक
पहुंचने के लिए
कोई राहगीर नहीं गिड़गिड़ाएगा
बडी संजीदगी से
वह कह सकेगा

तथास्तु.. तथास्तु... तथास्तु !
कवि 'रवि'


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