बुत परस्ती
वो लोग
जो कभी मुझे मेरी जुबान के लिए
सर आंखों पर बिठा लेते थे।
मेरा बुत बना कर
मुझे गूंगा कर गये।
अब के हाल ऐसा है
अनजाने लोग आते हैं
चंद फूल, मालाएं,
और दीपक जलता देखकर,
बडे ही शांत भाव से
नतमस्तक हो जाते हैं,
पास में रखी हुई दान पेटी में
कुछ धन अर्पित कर निकल लेते हैं
पता नहीं
उस बुत में वे क्या देखते हैं?
मैं असहाय सा
अपनी जुबां पर
लगाये गये लगाम को
देखता रहता हूं
पथरीली आंखों के सहारे।
चाहता हूं चीख चीखकर
उनसे कहूं
ये मैं नहीं हूं प्यारों
यह मेरा बुत है
जो तरस गया है
अपनी इस अबादत से
क्यों भुला बैठे हो
मेरे उस अहसास को
जो तुम्हें चराग की मानिंद
अंधेरे से उबार लाता था
बूझे हुए तुम्हारे जज़्बात को
नयी राह दिखा जाता था
मेरे कलाम मेरी तकरीरें
जीने की नयी आस
बंधा जाती थी
मेरे बुतखाने में आकर
मुझ पर फूल चढाकर
मुझसे कुछ मन्नतें
दुआ मांगते हो
मैं कैसे तुम्हें समझाऊं
मैं यहां नहीं हूं
मैं वहां हूं
जहां मेरी किताबें
किसी किताब घर में
दीमक की संगी बनी है
मेरे अल्फाज़ जो उनमें
बदस्तूर समाएं है
और चाहते हैं के कोई आये
उनपर चढी फफूंद से
निजात दिलाएं
उनके ज़रिए मेरे पैगाम
फिर से जमाने के रूबरू लाएं
सुनो सुनो मेरी चीखें सुनो
मै बुत में नहीं
तुम्हारे दिलों में बसना चाहता हूं
उसी प्यार मुहब्बत और अपनेपन को
जीना चाहता हूं
मैं जीना चाहता हूं
मैं जीना चाहता हूं
कवि 'रवि'

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