मैं और मेरा मय का पियाला
जाम लबालब मय में तरन्नुम
दिले मौसिकी और बहकापन
इक इक लम्हा नाच रहा है
थिरक रही है इक इक धड़कन
मैं और मेरा मय का पियाला
खुदा गवाह है सबसे आला
जो छू ले मदमस्त हो जाए
नहीं रह जायें कोई निराला
रोज़ पियो और रोज़ जियो तुम
कुदरत की हर चीज़ जियो तुम
नयन नक्श से एक है सब तो
क्यों नस्लों के भूखे हो तुम
कहता है कवि 'रवि' सभी से
तोडो फर्जी दीवारें अभी से
आओ चलकर भेद मिटाएं
इन्सानी फितरत जगाएं
मैं और मेरा मय का पियाला
खुदा गवाह है सबसे आला
कवि 'रवि'

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