बाप तो बाप होता है
दौरे अदम से आज तक
जिसका जिक्र अपने आप होता है
वो अलाहिदा हस्ती यानी बाप होता है
सुकून मिलता है हर मुश्किल में
जब अचानक दिख जाता है
खोई हुई तमाम ताकत का
यकायक तजुर्बा होता है
जिसकी नजरों का खौफ
दुष्मन को हिला देता है
वो चट्टान का दूसरा नक्श़
एक अकेला बाप होता है
उम्र के तकाजे से दूर जाकर
जो दिन रात फिक्र में गुजारता है
अपने औलाद का रुतबा बरकरार रहे
इस तमन्ना के लिए
हर ख्वाहिश को भुला देता है
सब कुछ लुटाकर भी
जीतने का एहसास करता है
इस दुनियादारी में
बस एक वो अपना बाप होता है
कवि 'रवि'

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