Wednesday, 21 June 2023

इत्तेफाक

मैं दास्ताने हकीकत का हिस्सा हूं

इत्तेफाक है

चलती चक्की में पीसता हुआ किरदार हूं

इत्तेफाक है

धूप तड़पाती है दरख्तों को जमीं को
धूप से तड़पे बादल भिगोते है ज़मीं को
ज़मीं पैदा करती है फिर और दरख़्त
इस्तकबाल इस क़दर तड़पने का

इत्तेफाक है

राहें चलकर मंज़िल में फना हो जाती है कहीं
सैलाब उफनकर समंदर में खो जाते हैं कहीं
मुहब्बतें पनपकर किताबों में सिमट जाती है कहीं
वो आसमां वाला हमें नज़र आ भी जाता है कहीं

इत्तेफाक है

देर रातों को मदमाती चांदनी लुभा जाती है
तड़पते दिल को सुकून दिला जाती है
खुलूसे दिल से इक रंगीन ग़ज़ल निकल आती है
सहर की भैरवी रुहानी समां बंधा जाती है

इत्तेफाक है 
कवि 'रवि'

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