इत्तेफाक
मैं दास्ताने हकीकत का हिस्सा हूं
इत्तेफाक है
चलती चक्की में पीसता हुआ किरदार हूं
इत्तेफाक है
धूप तड़पाती है दरख्तों को जमीं को
धूप से तड़पे बादल भिगोते है ज़मीं को
ज़मीं पैदा करती है फिर और दरख़्त
इस्तकबाल इस क़दर तड़पने का
इत्तेफाक है
राहें चलकर मंज़िल में फना हो जाती है कहीं
सैलाब उफनकर समंदर में खो जाते हैं कहीं
मुहब्बतें पनपकर किताबों में सिमट जाती है कहीं
वो आसमां वाला हमें नज़र आ भी जाता है कहीं
इत्तेफाक है
देर रातों को मदमाती चांदनी लुभा जाती है
तड़पते दिल को सुकून दिला जाती है
खुलूसे दिल से इक रंगीन ग़ज़ल निकल आती है
सहर की भैरवी रुहानी समां बंधा जाती है
इत्तेफाक है
कवि 'रवि'

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home