Thursday, 22 June 2023

अधूरी आस

वो मिला मुझे एक अरसे के बाद
नाम न रहा, मस्तिष्क में बस शक्ल रही याद
हल्के से थपथपाते हुए मैंने पूछा
भई कहीं मिले थे हम इससे पहले
कुछ आ रहा है क्या याद?

अकस्मात हुए इस मित्रपात से
थोडा वो उलझ सा गया
नखशिख मुझे निहारता रहा
पलभर के असमंजस के बाद
अत्यानंद से वो विभोर हो गया

बोला सहजता से एक बात ऐसी
शतप्रतिशत मेरे ही अवस्था जैसी
महाशय नाम तो मैं भूल गया हूं
पर उस प्रेम भाव को संजोए हुए हूं

अनायास ही दोनों की आंख भर आई
मनुष्य की मनुष्यता से पहचान हो गई
मैंने पहल की और कहा छोड़िये
मित्रता में क्या नामपर अडा रहा है कोई?

नाम को सार्थक स्वीकृति मिलती तभी है
जब चरित्र की चर्चा मित्रों में होती कभी है
हंसकर उसने सहमती जताई
दोनों के आनंद की परीसीमा न रही कोई

सर पर घने काले बालों की उम्र की पहचान
उजड़े चमन के बाद भी इस तरह चढी परवान
नाम जानने की चेष्टा न उसने की न मैंने की
उलजलूल बातें करते करते भेंट संपन्न की

दूर तक उसकी दिशा में मैं देखता रहा
वो जाता रहा उस तरफ परंतु मुझे ही देखता रहा

एक उधेड़बुन दिमाग में लेकर घर आ पहुंचा
विचारों के जंगल में अनेक संभावना खोजता रहा

हां उसकी यादों को संजोना मेरी जरूरत थी
अपनी जान जोखिम में डालकर
उसने मेरी बचाई थी

पर मुझे याद रखना
क्या उसकी भी अनिवार्यता थी

निष्कर्ष बस इतना ही निकाल पाया
पूर्व जन्म का रिश्ता कोई उसने निभाया

हां हो ही सकता है कि वो हो मेरा अपना
उसी के कारण जीवित है शरीर अपना 

हर दिन अब मैं ठीक समय पर वहां जाता हूं
वो फिर नज़र आ जाए, राह तकता हूं
क्या जाने क्यों पर वो नहीं आता
अधूरी आस लिए मैं घर लौट आता हूं

कवि 'रवि'

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