बरसती बूंदें
बरसती बूंदों का वो मंज़र
तिश्नगी बढा देता है
जिसे भुलाने को चाहा हरदम
घूमकर याद आता है
और प्यास जो धधकती आग सी
उन लम्हों को जलाती है
संगदिल समझने वालों को
वो समां रुला जाता है
नाकाम मुहब्बत को
सलीके से छुपाया था मगर
जब भी होती है बारिश
दिले माशूक याद आता है
झूमती झमाझम से
नाराज़ न हो 'रवि'
तुझे बदनुमा सा ये आलम
औरों को मज़ा देता है
कवि 'रवि'

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home