Tuesday, 27 June 2023

बरसती बूंदें

बरसती बूंदों का वो मंज़र
तिश्नगी बढा देता है
जिसे भुलाने को चाहा हरदम
घूमकर याद आता है

और प्यास जो धधकती आग सी
उन लम्हों को जलाती है
संगदिल समझने वालों को
वो समां रुला जाता है

नाकाम मुहब्बत को
सलीके से छुपाया था मगर
जब भी होती है बारिश
दिले माशूक याद आता है

झूमती झमाझम से
नाराज़ न हो 'रवि'
तुझे बदनुमा सा ये आलम
औरों को मज़ा देता है 

कवि 'रवि'


0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home