ये कैसा हुनर
ये कैसा हुनर
मेरे दोस्त आज़माते है
बात हया की करते हैं
हमाम में नंगे नहाते हैं
दिल दिमाग को
क़फ़स में डाले रख कर
कशीदे उनके तारीफ में
पढ़ने अक़्सर चले जाते हैं
फना हो गई सारी दुनिया
रूबरू एक नया तोहफा आया
तब की टोपी अब का बुखार
यकायक इमान बदल जाते हैं
बात अब वो कहां है 'रवि'
मंज़र इन्कलाबी नज़र आते थे
फरिश्ते आजकल यहां वहां
जी हुजूरी में लगे दिखाई देते हैं
कवि 'रवि'

0 Comments:
Post a Comment
Subscribe to Post Comments [Atom]
<< Home