Monday, 3 July 2023

ये कैसा हुनर

ये कैसा हुनर 
मेरे दोस्त आज़माते है
बात हया की करते हैं
हमाम में नंगे नहाते हैं

दिल दिमाग को
क़फ़स में डाले रख कर
कशीदे उनके तारीफ में
पढ़ने अक़्सर चले जाते हैं

फना हो गई सारी दुनिया
रूबरू एक नया तोहफा आया
तब की टोपी अब का बुखार
यकायक इमान बदल जाते हैं

बात अब वो कहां है 'रवि'
मंज़र इन्कलाबी नज़र आते थे
फरिश्ते आजकल यहां वहां
जी हुजूरी में लगे दिखाई देते हैं
कवि 'रवि'

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