मैं इकबार जी लूं
मैं इकबार जी लूं ऐ वक्त ऐ सितमगर
ज़मीं ना सही आसमां को ही छू लूं
के इन्सां की बस्ती में हारा हुआ हूं
वहां अपने अरमां की जन्नत ही पा लूं
मैं इकबार जी लूं.........
वो लम्हे जो हमने पाले जिगर में
रही मुश्किलें तो कहां तक सम्हालूं
मैं इकबार जी लूं........
लफ़्ज़ों को तासीर देता है कब-तक
'रवि' बस दुआ कर खुदा तुझ को पा लूं
मैं इकबार जी लूं.....
कवि 'रवि'

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