Thursday, 30 April 2026

वो रात जिस को कभी

वो रात जिस को न कभी भूल सके हम 
बा वफ़ा भी, लेकिन जिक्र कर न सके हम 
चाहतें हजार उनकी निभाने की ललक थी 
हुए रूबरू तो कुछ भी कह न सके हम 
अज़ल और फ़ज़ल दोनों ही से बेगुमान रहे 
ताउम्र बदस्तूर कभी जी न सके हम 
चल आज 'रवि' उस दीवार में सेंध लगाएं
जिस पे सर पटक के सुकून पा न सके हम 
लकीरें आदतन उलझती है अनजान थे 
तकदीर से लिपट गई कब ये जान न सके हम 
कवि 'रवि' 

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