हे सृष्टि के रचयिता
हे सृष्टि के रचयिता
सृजन-पालन-विनाश की तेरी लीला है
सब जीवों को जन्माता समान है
फिर मनुष्य क्यों निराला है
हे सृष्टि के रचयिता
जीवो जीवस्य जीवनम् की तेरी परिभाषा से
मनुष्य पर क्यों निर्बंध नहीं डाला है
हे सृष्टि के रचयिता
परम बुद्धि का स्वामी है तू
मनुष्य निर्माण में फिर कैसे
तूने गलती कर डाला है
हे सृष्टि के रचयिता
करना है सृष्टि संयोजन गर तुझे
तो सबसे पहले यह महसूस कर
गलतियों का अंबार है मानव
जिसे तूने नाजों से पाला है
आज तेरी बनाई व्यवस्था पर
उसने हमला बोल डाला है
कवि 'रवि'

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