Sunday, 19 April 2026

एक नाज़ुक सी तमन्ना

ज़माने भर की खुशियां तेरे कदमों में ला के भर दूं 
मेरा बस चले तो नाकामयाबी को दफ़न ही कर दूं 
हर इक कोशिश होती है मेरी तेरे वास्ते ही 
शामों सहर को हौसले से भर कर तूझे पेश कर दूं 
ये बेदर्द ज़माना चाहे जितना भी सितम कर ले 
लुटाकर मुझे मैं तेरे चेहरे पे मुस्कराहट भर दूं 
दस्तूर ए मुहब्बत है वफ़ा की खातिर कुर्बान हो जाएं 
तेरे साथ मिलकर मैं बेमुरव्वत तकदीर को नाकाम कर दूं 
आबोहवा मेरी खुशमिजाजी को कितनी ही ठेंस लगाये 
मैं हरेक रहमों करम में तेरी शुक्रगुजारी भर दूं 
इक आह भी तेरे लबों से निकल आए तो यकीन रख 
मैं काइनात को तेरे कदमों पर निछावर कर दूं 
कवि 'रवि'

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