एक नाज़ुक सी तमन्ना
ज़माने भर की खुशियां तेरे कदमों में ला के भर दूं
मेरा बस चले तो नाकामयाबी को दफ़न ही कर दूं
हर इक कोशिश होती है मेरी तेरे वास्ते ही
शामों सहर को हौसले से भर कर तूझे पेश कर दूं
ये बेदर्द ज़माना चाहे जितना भी सितम कर ले
लुटाकर मुझे मैं तेरे चेहरे पे मुस्कराहट भर दूं
दस्तूर ए मुहब्बत है वफ़ा की खातिर कुर्बान हो जाएं
तेरे साथ मिलकर मैं बेमुरव्वत तकदीर को नाकाम कर दूं
आबोहवा मेरी खुशमिजाजी को कितनी ही ठेंस लगाये
मैं हरेक रहमों करम में तेरी शुक्रगुजारी भर दूं
इक आह भी तेरे लबों से निकल आए तो यकीन रख
मैं काइनात को तेरे कदमों पर निछावर कर दूं
कवि 'रवि'

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