जय श्री राम
वर्ष प्रतिपदा अर्थात चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, जिसे मराठी भाषा में गुढी पाडवा भी कहते है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उत्सवों की श्रृंखला में सम्मिलित हैं। इस वर्ष यह उत्सव अंग्रेजी कैलेंडर अनुसार शनिवार दिनांक २ अप्रैल २०२२ को हैं। आइये आज हम इस दिन के महात्म्य का विस्तृत विवेचन करते हैं।
इस दिन से शालिवाहन संवत्सर तथा छत्रपति शिवाजी महाराज के शिव शक की प्रथम तिथि प्रारम्भ होती है। पुराणों के अनुसार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने इसी दिन सृष्टि का सृजन किया है। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो वेदांग का दिन दर्शिका यह अंग सृष्टि के पहले से प्रतिष्ठित है। जैसे कि सनातन हिंदू संस्कृति अजर अमर है उसी प्रकार हमारे शास्त्रीय अधिष्ठान भी अजरामर है। वेद अपौरुषेय है ऐसा कहते समय यह धारणा सुनिश्चित होती है कि हमारी गोचर सृष्टि के पहले से सभ्यता का अस्तित्व रहा है।
गुढी पाडवा के दिन के विषय में कुछ पौराणिक कथाओं को मैं यहां उद्धृत करने की लालसा को रोक नहीं पा रहा हूं, अतः संक्षिप्त में आइये उनसे अवगत हो कर आगे बढ़ेंगे।
१ महाभारत के आदिपर्व में उपरिचर राजा ने उसे इंद्र द्वारा प्राप्त बांस की काठी का पृथ्वी पर अधिष्ठान कर उसकी पूजा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को की थी। इस परंपरा का आदर करते हुए अन्य राजाओं ने भी उसे अपनाया और यह परंपरा अखिल भारत वर्ष में प्रचलित हुई।
२ रामायण कालीन इतिहास के अनुसार भगवान श्री राम चौदह वर्ष का वनवास तथा महाबली रावण का उद्धार कर अयोध्या लौटने का समय यही है और उसके उपलक्ष्य में आनंदोत्सव का आयोजन किया गया था जो आजतक हम मनाते आये हैं।
३ शालिवाहन नामक एक कुम्हार के पुत्र ने छह सहस्त्र मृत्तिका प्रतिमाओं की स्थापना कर उनमें जीव धारणा करा कर शकों को पराभूत किया था और तत्पश्चात इस दिन से शालिवाहन शक की स्थापना हुई।
चैत्र शुद्ध प्रतिपदा का शास्त्रीय महत्व समझें तो यह है कि पृथ्वी पर वसंत ऋतु का प्रभाव होने से वातावरण में वनस्पतियों का भी एक प्रकार से उत्सव का कार्यकाल रहता है। बहुतांश पेड फूलों से, फलों से भारित होते हैं और सृजन की एक वार्षिक प्रक्रिया संपन्न होती हैं। फसलें पूरी होकर अन्न संचय परिपूर्ण होता है। ऐसे आल्हादकारी अनुभूति को हिंदुओं ने उत्सव में परिवर्तित किया है। एक प्रकार से संघ में यह उत्सव राष्ट्रीय अस्मिता का द्योतक माना गया है।
संयोगवश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूजनीय आद्य सरसंघचालक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी का भी यह जन्मदिन है। यही कारण है कि इस दिन ध्वजारोहण करने से पूर्व डॉ साहब को संघप्रणाम दिया जाता है। कुटिल राजनीति में माहिर अंग्रेजी सत्ता ने हिंदु समाज का तेजोभंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। ऐसे समय डॉक्टर जी के दूरदृष्टी पूर्ण निर्णय से रा स्व संघ ने वर्ष प्रतिपदा को पुनः सार्वजनिक करने का कार्य किया है। विश्व भर में बढते यांत्रिकी करण से एक तरफ भोगवाद का स्वैर प्रभाव पड़ता जा रहा था तो दूसरी तरफ़ हमारी साधन संपन्नता का बाहरी शक्तियों ने अमर्याद शोषण किया था। विडंबना यह थी कि उस चकाचौंध में हमारे बुद्धिजीवी भी अपनी आस्था परंपराओं को दुत्कार कर अंग्रेजों की सिखाई विलासिता के मायाजाल में खो रहे थे। अंग्रेजों के इस फुटिरता वादी कारनामों को भांपकर लोकमान्य तिलक जी जैसे अन्य कई द्रष्टाओं ने समाज में एकत्व का पुनरुज्जीवन कराने हेतु कितने ही आयाम स्थापित किए। परम पूजनीय डॉक्टर जी का संघ स्थापना का उद्देश्य भी यही था कि समाज एक विचार, एक धारणा तथा सर्वसमाहित कार्य में अपनी शक्ति लगाएं और छत्रपति शिवाजी महाराज की दिखाई राह पर चल कर एकात्म भाव से राष्ट्र सेवा में लगे, राष्ट्र के उत्थान के प्रति सजग बनें, राष्ट्रोन्नती के लिए अथाह त्याग की भावना को बल दें। उनकी विस्तृत सोच का परिणाम है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य निस्वार्थ भाव से न केवल भारतीय उपमहाद्वीप में अपितु विश्व भर में दृष्टिगोचर होता है और सराहा भी जाता है। बिना किसी आडंबर के हर आयु के स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेतृत्व द्वारा नीर्धारित कार्यक्रम में अपना अधिकतर अर्पण करते हैं। निकट भविष्य में अर्थात इसवी सन २०२५ में संघ अपनी १०० वी वर्षगांठ मनाने जा रहा है।
परम पूजनीय आद्य सरसंघचालक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी के दूरदृष्टी से प्रवाहित इस राष्ट्र कार्य में आइये हम सभी भारतीय अधिक से अधिक सम्मिलित हों और विश्वानुवर्ति एकात्मता को स्थापित करने में अपना सहयोग दें।
भारत माता की जय
रविन्द्र सरदेशमुख (कवि'रवि')