Wednesday, 30 March 2022

राष्ट्र गान

हिंदु भू को सब समर्पण
हमने किया संकल्प है
                  मातृभू तुझपर निछावर
                  जान यही विकल्प है
राह में भगवे की चलकर
एक हिंदुस्थान होगा
                  वंचना कोई न होगी 
                  सबही का विकास होगा
देश में प्रतिघात की
धृष्टता कोई करे तो
                 एकही आवाज में
                 पुरजोर तब प्रतिकार होगा
ऐ मॉं मेरी तेरी शरण में
शांति है सुख चैन है
                 जीयूं मरूं तेरे चरण में
                 बलिदान मेरा सार्थ होगा
कवि'रवि'


Monday, 28 March 2022

शबनम

वो 'शबनम' थी मेरी जो कांधे को प्यारी
कैसे बखानूं ........ थी कितनी दुलारी
सुबह जब निकलते थे घर से तो यारों
सजी थी क़िताबें इसके भीतर ही प्यारों
कालेज की हवाएं बड़ी शोख हरदम
संभालें न सम्हले वो कांधे की 'शबनम'
कभी फूल होता कभी खत की बारी
दिलों जां की हमदर्द 'शबनम' वो प्यारी
ये ऐसा निशां थी..... वो अहसास करते
बड़ी आसमंदी........ वो महसूस करते
हमें यूं गुमां था....... के हम हैं रहमगर
असल में तो हकदार 'शबनम' थी यारों
कभी याद करते हैं...... लम्हें वो सारे
बसी है खयालों में 'शबनम' भी प्यारे
कवि 'रवि'



Thursday, 24 March 2022

हमारे उत्सव

जय श्री राम
वर्ष प्रतिपदा अर्थात चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, जिसे मराठी भाषा में गुढी पाडवा भी कहते है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उत्सवों की श्रृंखला में सम्मिलित हैं। इस वर्ष यह उत्सव अंग्रेजी कैलेंडर अनुसार शनिवार दिनांक २ अप्रैल २०२२ को हैं। आइये आज हम इस दिन के महात्म्य का विस्तृत विवेचन करते हैं।
इस दिन से शालिवाहन संवत्सर तथा छत्रपति शिवाजी महाराज के शिव शक की प्रथम तिथि प्रारम्भ होती है। पुराणों के अनुसार सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने इसी दिन सृष्टि का सृजन किया है। दूसरे शब्दों में कहा जाय तो वेदांग का दिन दर्शिका यह अंग सृष्टि के पहले से प्रतिष्ठित है। जैसे कि सनातन हिंदू संस्कृति अजर अमर है उसी प्रकार हमारे शास्त्रीय अधिष्ठान भी अजरामर है। वेद अपौरुषेय है ऐसा कहते समय यह धारणा सुनिश्चित होती है कि हमारी गोचर सृष्टि के पहले से सभ्यता का अस्तित्व रहा है।
गुढी पाडवा के दिन के विषय में कुछ पौराणिक कथाओं को मैं यहां उद्धृत करने की लालसा को रोक नहीं पा रहा हूं, अतः संक्षिप्त में आइये उनसे अवगत हो कर आगे बढ़ेंगे।
१ महाभारत के आदिपर्व में उपरिचर राजा ने उसे इंद्र द्वारा प्राप्त बांस की काठी का पृथ्वी पर अधिष्ठान कर उसकी पूजा चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को की थी। इस परंपरा का आदर करते हुए अन्य राजाओं ने भी उसे अपनाया और यह परंपरा अखिल भारत वर्ष में प्रचलित हुई।
२ रामायण कालीन इतिहास के अनुसार भगवान श्री राम चौदह वर्ष का वनवास तथा महाबली रावण का उद्धार कर अयोध्या लौटने का समय यही है और उसके उपलक्ष्य में आनंदोत्सव का आयोजन किया गया था जो आजतक हम मनाते आये हैं। 
३ शालिवाहन नामक एक कुम्हार के पुत्र ने छह सहस्त्र मृत्तिका प्रतिमाओं की स्थापना कर उनमें जीव धारणा करा कर शकों को पराभूत किया था और तत्पश्चात इस दिन से शालिवाहन शक की स्थापना हुई।
चैत्र शुद्ध प्रतिपदा का शास्त्रीय महत्व समझें तो यह है कि पृथ्वी पर वसंत ऋतु का प्रभाव होने से वातावरण में वनस्पतियों का भी एक प्रकार से उत्सव का कार्यकाल रहता है। बहुतांश पेड फूलों से, फलों से भारित होते हैं और सृजन की एक वार्षिक प्रक्रिया संपन्न होती हैं। फसलें पूरी होकर अन्न संचय परिपूर्ण होता है। ऐसे आल्हादकारी अनुभूति को हिंदुओं ने उत्सव में परिवर्तित किया है। एक प्रकार से संघ में यह उत्सव राष्ट्रीय अस्मिता का द्योतक माना गया है।
संयोगवश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक परम पूजनीय आद्य सरसंघचालक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी का भी यह जन्मदिन है। यही कारण है कि इस दिन ध्वजारोहण करने से पूर्व डॉ साहब को संघप्रणाम दिया जाता है। कुटिल राजनीति में माहिर अंग्रेजी सत्ता ने हिंदु समाज का तेजोभंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। ऐसे समय डॉक्टर जी के दूरदृष्टी पूर्ण निर्णय से रा स्व संघ ने वर्ष प्रतिपदा को पुनः सार्वजनिक करने का कार्य किया है। विश्व भर में बढते यांत्रिकी करण से एक तरफ भोगवाद का स्वैर प्रभाव पड़ता जा रहा था तो दूसरी तरफ़ हमारी साधन संपन्नता का बाहरी शक्तियों ने अमर्याद शोषण किया था। विडंबना यह थी कि उस चकाचौंध में हमारे बुद्धिजीवी भी अपनी आस्था परंपराओं को दुत्कार कर अंग्रेजों की सिखाई विलासिता के मायाजाल में खो रहे थे। अंग्रेजों के इस फुटिरता वादी कारनामों को भांपकर लोकमान्य तिलक जी जैसे अन्य कई द्रष्टाओं ने समाज में एकत्व का पुनरुज्जीवन कराने हेतु कितने ही आयाम स्थापित किए। परम पूजनीय डॉक्टर जी का संघ स्थापना का उद्देश्य भी यही था कि समाज एक विचार, एक धारणा तथा सर्वसमाहित कार्य में अपनी शक्ति लगाएं और छत्रपति शिवाजी महाराज की दिखाई राह पर चल कर एकात्म भाव से राष्ट्र सेवा में लगे, राष्ट्र के उत्थान के प्रति सजग बनें, राष्ट्रोन्नती के लिए अथाह त्याग की भावना को बल दें। उनकी विस्तृत सोच का परिणाम है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्य निस्वार्थ भाव से न केवल भारतीय उपमहाद्वीप में अपितु विश्व भर में दृष्टिगोचर होता है और सराहा भी जाता है। बिना किसी आडंबर के हर आयु के स्वयंसेवक संघ के शीर्ष नेतृत्व द्वारा नीर्धारित कार्यक्रम में अपना अधिकतर अर्पण करते हैं। निकट भविष्य में अर्थात इसवी सन २०२५ में संघ अपनी १०० वी वर्षगांठ मनाने जा रहा है।
परम पूजनीय आद्य सरसंघचालक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी के दूरदृष्टी से प्रवाहित इस राष्ट्र कार्य में आइये हम सभी भारतीय अधिक से अधिक सम्मिलित हों और विश्वानुवर्ति एकात्मता को स्थापित करने में अपना सहयोग दें। 
भारत माता की जय
रविन्द्र सरदेशमुख (कवि'रवि')

Monday, 21 March 2022

The Kashmir Files

Yeh, by now the fever is at the top
N they are mourning who thought it would be flop

Of course, it would lead to shut their shop
No one is there to wipe their tears, not even a mop

Yet they don't smell the fragrance of the tide
B'coz they're narrow minds, not the eyes wide

But yes I am sure, this everlasting mode of the mood
Will shread them fully and uproot their hood

With a bang in the body and soul
Hindu on this earth is rising high without any foul

Oh my holy nation
Be your pride live... always live.
Poet 'Ravi'

Friday, 18 March 2022

कश्मीर मधील आतंकवाद आणि आपण

आज कश्मिर फाइल्स हा चित्रपट बघितला. मनाला एकमेव विचाराने पछाडले आहे. खरंच कां हे आतंकी हत्याकांड आणि कश्मिरी हिंदुंचे विस्थापित होणे आमच्या साठी त्या काळी केवळ बातमी पुरतेच मर्यादित होते. आज चित्रपट बघितल्यावर मनाला सुन्न करणारा हा प्रश्न डोक्यात गिरणीच्या भोंग्याच्या तीव्रतेने घणाणतो आहे.
चित्रपट कश्मिर चा इतिहास सांगतो तेंव्हा भारतीय संस्कृतीच्या अभिजात दर्जाचं उगमस्थान कश्मिर आहे हे आवर्जून सांगतो. हे ही प्रकर्षाने दाखवतो की वेदविद्या आणि परंपरांना अविरत जीवंत ठेवून विकसित करताना त्या प्रदेशातील निसर्ग अबाधित ठेवण्यातही त्या ज्ञानी मंडळींनी कोणतीही कसर ठेवली नाही. अगदी अलिकडच्या काळापर्यंत म्हणजेच कश्मिर मध्ये मुसलमानी दहशतवाद फोफावण्या आधी पर्यंत हा प्रदेश आशिया खंडातील नंदनवन म्हणून संबोधल्या जायचा. उणे पुरे २४-२५ वर्ष विक्षिप्त राजकारणी आमच्या नामर्द पणामुळे सत्तेवर निवडून येत राहिले आणि त्यांनी ह्या नंदनवनाचं पार वैराण जंगल करून टाकलं. 
लोकशाही नावाच्या बुजगावण्यानं आम्हाला नपुंसक बनवलंय की काय असा चीड निर्माण करणारा प्रश्न अंतर्मन पोखरून टाकतो आहे. पुरातन काळापासून अनेक रथी महारथींची चरित्रे आपण वाचत आलोय, ऐकत आलोय इतकेच नाही तर चित्रपटाच्या माध्यमातून बघतही आलोय. विडंबना ही की हे सगळं घडवून आणणारे सगळे पोटार्थी निघालेत. त्यांनी ही चरित्रे आम्हाला शौर्य आणि वीरता जागृत व्हावी अशा पद्धतीने नाही तर रंजक करून सांगितली, आणि दुर्दैवाने ही चरित्रे आमच्या मनोरंजनात अडकून खोलवर गाडली गेलीत.
विश्व बंधुत्वाची आमची जी संकल्पना आहे ती आदिम काळापासून चालत आलेल्या सनातन संस्कृतीशी निगडीत आहे. त्या काळात जितक्या म्हणून सभ्यता अस्तित्वात होत्या, त्या सर्वांचा पाया सनातन संस्कृतीच्या अभंग आणि ह्या सृष्टी इतक्याच शाश्वत वैचारिक पातळीवर उभारला गेला होता. सातव्या शतकापासून मुसलमानी संप्रदाय एका राक्षसी मनोवृत्ती तून जन्मला आणि भोगवादाची कास धरून अवघ्या धरणी वर धुमाकूळ घालता झाला. सतराव्या शतकापासून यूरोपीय देशांमध्ये महाविनाशी औद्योगिक आस्थापनांचा उदय झाला आणि तेथील रहिवासी ख्रिस्ती धर्मियांच्या हाती जणू जादूची कांडी लागली. त्यांना सुद्धा आसुरी आकांक्षांना पेव फुटल्यासारखे झाले आणि त्यांनी देखील जगभरातील मानवजातीची दैना करण्यात संपूर्ण शक्ती झोकून दिली. आता ही जीवघेणी स्पर्धा मुसलमान आणि ख्रिस्ती धर्मियांच्या तथाकथित धुरिणांनी आपापल्या प्रतिष्ठेची करून पृथ्वी वर रणकंदन माजवले. आज आपण जगभर असंख्य राष्ट्रे एकतर मुसलमानी किंवा ख्रिस्ती धर्मियांच्या प्रभावाखाली असल्याचे बघत आहोत. हिंदु धर्म किंवा हिंदु धर्माची उपांगे असलेली बौद्ध-जैन-शीख आणि तत्सम इतर पंथ संप्रदाय मात्र आपल्या ऊच्च विचारसरणीचे अनुसरण करीत राहिली. माहिती आणि तंत्रज्ञान क्षेत्रातील विलक्षण उपलब्धीचं फलित आहे की आज जगातील सगळ्या धर्माच्या सामान्य जनतेमध्ये जागृती निर्माण होते आहे आणि त्यातून शाश्वत अशा भारतीय संस्कृती चा अभ्यास केला जात आहे. हळूहळू का होईना पण हिंदु संस्कार आता मुख्यत्वे आत्मसात केली जात आहेत.
हीच आता हिंदुंसाठी सुवर्ण संधी आहे की त्यांनी जगभर अव्याहतपणे हिंदु संस्कृतीचा, परंपरांचा प्रचार प्रसार करून ज्वालामुखी च्या तोंडावर उभ्या असलेल्या मानवजातीला योग्य ती दिशा द्यावी, जगाचं कल्याण करावं. वर्तमान युगातील समंजस मानव नृशंसतेला थारा देत नाही हा अनुभवण्याचा विषय आहे. वसुधैव कुटुंबकम् म्हणताना त्या उक्तीप्रमाणे कृती करणं क्रमप्राप्त आहे. विश्व शांति मंत्राची शक्ति जगाला तेंव्हाच कळेल जेंव्हा आम्ही समग्र भारतीय त्यांचं उच्चरवाने गायन करू. दुनिया झुकती है, झुकानेवाला चाहिए ही उक्ती कालबाह्य झाली असून दुनिया समझती है समझाने वाला चाहिए ही उक्ती मोदीजींनी प्रचलित आणि सिध्द करून दाखविली आहे. तेंव्हा या पुढे आपणच आपले स्वयंसिद्ध होउयात आणि जगातील सगळ्या मानवजातीला सन्मार्गावर आणुयात.
जय श्रीराम
वैचारिक क्रांतिने जगाचं कल्याण होवो.
कवि 'रवि'

Friday, 11 March 2022

एक अनामिक भीती

चाल: रिमझिम झरती श्रावण धारा....)
झर झर झरती घामाच्या धारा
चड्डी च्या बुदल्यात....
नवाबाविण भकास झाली रात....||धृवपद||
धडक धडकते मन हे व्याकुळ
जेंव्हा ऐकतो बाहेर 'सायरन'
येईल का ई डी माझ्या दारी
सहजचि येई मनात.....नवाबाविण...||१||
संजय वदतो मिथ्या वाणी
ऐकुनी तव ते होई पाणी पाणी
जाईल कां हे वैभव लोपुन
तुरुंग दिसे स्वप्नात.....नवाबाविण ...||२||
कवि 'रवि'

Friday, 4 March 2022

होय आम्ही लेकुरे

होय आम्ही लेकुरे...
तो बाप अमुचा भस्मधारी 
शर वेधुनी शिरच्छेद घडवू ....
पुरतील शत्रू जोवरी.....१
हा धर्म अमुचा एक ऐसा की असे 'जगतांतरी'
जो कधी ना व्यर्थ मागे 'रक्त सिंचन' भू वरी...२ शंभु शंभु चिंतुनी खड्गे उसळती वैऱ्यावरी
ऐकुनी चित्कार 'त्यां'चा शमते क्षुधा अन वैखरी..३
चल 'रवि' साधू निशाणा एकेक त्या छद्मावरी
अक्षरांचे तीर झडू दे, तोतया स्वजनांवरी...४
कवि'रवि'