हिंदु धार्मिक वास्तुओं का विदृपीकरण तथा अतिक्रमण:
हाल के दिनों में हम यह वार्ता लगभग सभी माध्यमों पर लगातार चर्चा में देख रहे हैं कि,
मुग़ल तथा अन्य आक्रांताओं द्वारा हमारे पुरातन वास्तुशिल्प और धार्मिक मान्यताओं के स्थलों को ध्वस्त कर उनकी जगह मस्जिदें बनवाई गई है।
इन वार्ताओं को लेकर समूचे भारत में जगह जगह हूंकार प्रकट हो रहा है और इनकी सत्यता का न्यायिक स्वरूप जांचने के लिए न्यायालयों में हिंदु समुदाय की ओर से गुहार लगाई जा रही है। दूसरी तरफ इन बिगाड़ी गई जगहों के लिए मुसलमानों के पैरोकार विचित्र दलीलें देते हैं।
एक दौर था साधारण ढाइसौ तीनसौ वर्ष पहले का जब मुगलों का हैदोस पुरे भारत में छाया हुआ था। एक संदर्भ यहां पर उचित होगा कि उस समय विभिन्न देशों के प्रवासी भारत में यात्रा करने आते थे, जिनमें से कई नामवंत प्रवास लेखक भी थे। यह हमारा सौभाग्य है कि ऐसे निश्पक्ष प्रवासियों ने तब का आंखों देखा हाल अपने पुस्तकों में लिख रखा है।
अब वर्तमान में ऐसी अनेक वास्तुओं को हिंदु समाज को हस्तांतरित करने की मांग उठी है और उसके लिए याचिकाएं न्यायप्रविष्ट है।
न्याय व्यवस्था की विभीषिका: यहां की न्याय व्यवस्था की एक खास बात है कि, यहां सेवानिवृत्त कर्मचारियों को नियमित रूप से अपने जिवित होने का दाखिला देना अनिवार्य है ताकि उनको दी जाने वाली सुविधाएं कायम रह सकें। स्पष्ट करना चाहूंगा कि यहां ऐसी भी व्यवस्था है कि मृत व्यक्ति का विवरण प्रेतयात्रा स्मशान में पहुंचते ही करना अनिवार्य है। अर्थात, मृत्यु की नोंद देह के क्रियाकर्म से पूर्व ही पूरी हो जाती है। आधुनिक भारत में इंटरनेट या अंतर्जाल का प्रसार और प्रयोग ग्राम स्तर तक पहुंच गया है और सभी गतिविधियां अंतर्जाल पर अविलंब दर्ज की जाती है। तब प्रश्न यह उठता है कि मनुष्य को जीवित या मृत होने की घोषणा बारंबार क्यों करवाना जरूरी है? न्यायव्यवस्था का यह एक विनोद है कि सिस्टम को सुधारने, अद्यतन बनाने का आदेश न देकर स्वयं को जिवित प्रमाणित करवाना उसे सहज लगता है।
उपरोक्त उदाहरण का औचित्य यह है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने बीते ७५ वर्षों में अनेक ऐतिहासिक वास्तुओं का उत्खनन कर अनेकों सत्यदर्शी सिद्धांत और गवाहों को स्थापित किया है। लेकिन न्याय व्यवस्था हर पहलू का सत्यापन सच को झूठ और झूठ को सच साबित करने की महारथ हासिल किए हुए वकीलों द्वारा पेश कराने पर आग्रही है। पुरातत्व का अध्ययन जो कुछ स्पष्टतया दिखाता है वो सत्य वकील को साबित क्यों करना चाहिए? एक वकील 'है' कि लड़ाई लड़ेगा तो दूसरा 'नहीं' की लड़ाई लडता है। करोड़ों मुकदमे ऐसे हैं जहां मानवी जीवन का सीधा संबंध है मगर उनकी प्राथमिकता न के बराबर है।
हम भारत के हिंदुजन पता नहीं किस तरह के रसायन की उत्पत्ति है कि हमारी बर्फ़ बन चुकी संवेदनाएं कभी पिघलती ही नहीं, मस्तिष्क जागृत होता ही नहीं। अधिक से अधिक इतना ही होता है कि हम असहाय होने का स्वांग रच कर दिन की इतिकर्तव्यता कर निद्राधीन हो जाते हैं। चिरनिद्रा से भी भयानक है हिंदु समाज की आत्मग्लानि।
क्या संघ सेवा का यह एक अंग नहीं होना चाहिए कि हम मुखर हो कर ऐसी दरेक अनुचित, अप्राकृतिक, अप्रासंगिक विधियों को असंवैधानिक करार दिए जाने के लिए समाज के हर स्तर तक न पहुंचे? क्या आने वाली पीढ़ियों को एक स्वच्छ सामाजिक स्थिति मुहैया कराना हमारा कर्तव्य नहीं? क्या योग्यता पूर्ण व्यक्तियों का चयन करा कर प्राकृतिक भारत का पुनर्निर्माण करना हमारा लक्ष्य नहीं होना चाहिए?।
अंततः एक बड़ा ही गंभीर परंतु अत्यावश्यक विषय मैं चर्चा में लाना चाहूंगा वह यह कि जिस तरह आक्रांताओं ने जबरदस्ती से वास्तुशिल्प हथियाने का क्रूर कर्म किया, वैसे ही उन्होंने तथा पादरियों ने हमारे हिंदु परिवारों का धर्म परिवर्तन करानेका पाप भी किया है।
छत्रपति शिवाजी महाराज जी ने हमें ऐसे निष्पाप परिवारों की घर वापसी का मार्ग प्रशस्त करवाया है। इस प्रावधान की सहायता से हमें जितना शक्य है उनकी सहायता कर घर वापसी का प्रयास करना चाहिए।
जय श्री राम
कवि'रवि'