Sunday, 26 May 2024

भजन:

तन में ऊर्जा मन में ऊर्जा 
सबकुछ ऊर्जावान हुआ 
संकट सब मोरे दूर भये 
प्रभु जब भी तेरा नाम लिया 

देह भान अब कछु ना रहिबे 
मन में तोरा नाम चलै
कण कण जो चमके है हर पल 
दर्शन तेरा मान लिया 

सूक्ष्म विराट दृश्य अदृश्य 
तेरी छबि है अनजानी 
तेरा सबहिं दर्शन पावै 
जिसने जैसा ठान लिया 

मात-पिता-घर ग्राम नगर में 
जहां कहीं संचार हुआ 
कहें 'रवि' अंधियारे में प्रभु
तेरा साक्षात्कार किया 
जय श्री राम जय श्री राम 🙏
कवि 'रवि'

Thursday, 23 May 2024

खोज

ढूंढता रहता हूं यारों क्या कमी मुझमें रही 
सोचता हूं पूरी कर लूं जिंदगी और ना रही 
एक अफसाना अधूरा जो कभी लिख्खा नहीं 
रंजो ग़म की वो तपिश अब जिगर में ना रही 
याद आता है जब दर्दो अलम उस रात का 
एक सनक सी गूंजती है बाकी कसक अब ना रही 
ज़ख्मे जीगर को ना चाहिए कोई दवा 
हो भी गर हमदर्द, काम की कोई दुआ अब ना रही 
मेरी वहशत का मैं वारिस बाकी कुछ ना है 'रवि'
जल चुका जब आशियां फरियाद कोई ना रही 
कवि 'रवि' 

Wednesday, 22 May 2024

सब्र

मेरा मंजिल की तरफ जाना 
कभी बेकरारी न थी 
मैं जानता था वो मेरी 
आखरी मंजिल न थी 
लोग जो राहे अदल पर 
शिरकते कारवां किये 
एक अदद मकाम तक भी 
उनकी सब्र बाकी न थी 
क्या ही अब इल्ज़ाम दे यारों उन्हें 
जो यक ब यक रुसवा हुए 
कोई राह 'रवि' बाकी नहीं 
तूने कभी देखी न थी 
कवि 'रवि'

तमन्ना

सोचता हूं जागकर मैं रात को रुसवा करूं 
 सोचूं फिर नाकाम हूं जागकर भी क्या करूं 
सांस ना लेने की मोहलत भी नहीं है क्या करूं 
सांस को भीतर दबाने के लिए मैं क्या करूं 
एक पल की जिंदगी तू इस कदर लंबी हुई
काबिले बर्दाश्त ना हो तो भी जियूं क्या करूं 
आबाद हूं जाने जहां पर मैं तो बुत भी ना रहा 
वो पुकारें रोज़ मुझको ना सुनूं मैं क्या करूं 
लम्हे लम्हे की कड़ी बढती रही ऐ आसमां 
वो सिरा पिछडा कहां अंजान हूं अब क्या करूं 
रात भी रुकती नहीं है सोच भी ऐसी 'रवि'
लाख ठुकराता हूं पर करती हुकूमत क्या करूं 
कवि 'रवि'

आगोश ए स्याही

अब अंधेरों से लिपट कर रात गुमसुम हो गई 
जो न सोची थी कभी वो बात ऐसी हो गई 
मैं अकेला आसमां को रातभर देखा किया 
आंख भी झपकी नहीं और संग सी वो हो गई 
एक लम्हा वो खुदा दे दे तसल्ली चाहे अगर 
इश्क बेमानी के फिर कायनात ऐसी हो गई 
अपनी आबादी को कैसे ढूंढ लोगे स्याह में 
वो फ़ना हो कर है गुज़री रात जैसे हो गई 
कवि 'रवि'

वस्ल की रातों का सफर

वस्ल की रातों का तन्हा होना 
चांद के दीदार का इंतजार होना 
गर्दिश में हस्ती का फ़ना होना 
रूह की तड़पन का ऐतबार होना 
उम्र दराज का असर नज़र पर होना 
रस्मों की दीवारों का पर्दा होना 
 जिंदगी का मज्हार में बसर होना 
कैसा सिला पाया हमने 
हुस्न के क़फ़स में अगुवा होना 
कवि 'रवि'